
Starlink India Approval: भारत में एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा पर संसद की नजर, निशिकांत दुबे की समिति करेगी देरी पर चर्चा
भारत में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू होने में हो रही देरी का मामला अब संसदीय समिति में उठने जा रहा है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को विस्तृत चर्चा के लिए चुना है। 14 अक्टूबर 2026 को समिति की बैठक के बाद निशिकांत दुबे ने बताया कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी। ऐसे में स्टारलिंक को भारत में व्यावसायिक सेवा शुरू करने की मंजूरी मिलने में हो रही देरी और एलन मस्क की ओर से लगाए गए आरोपों पर भी विचार किए जाने की संभावना है।
एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भारत में स्टारलिंक की एंट्री में देरी को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूह अपने एकाधिकार को बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारतीय बाजार में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मस्क ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी का जिक्र करते हुए व्यंग्यात्मक टिप्पणी भी की थी और सवाल उठाया था कि क्या भारतीय फैसलों पर उनका प्रभाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा है। हालांकि, ये मस्क के आरोप हैं और इन्हें लेकर किसी कारोबारी समूह के खिलाफ निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
भारत सरकार ने मस्क के आरोपों को खारिज किया है। संचार मंत्रालय का कहना है कि भारत में सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। मंत्रालय के मुताबिक, सभी कंपनियों को व्यावसायिक सेवा शुरू करने से पहले निर्धारित सुरक्षा शर्तों और नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। सरकार ने यह भी कहा है कि स्टारलिंक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और यूटेलसैट वनवेब मंजूरी की प्रक्रिया में लगभग समान स्तर पर हैं। ऐसे में किसी एक कंपनी को जानबूझकर निशाना बनाए जाने के आरोपों को सरकार ने बेबुनियाद बताया है।
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की तैयारी कर रही प्रमुख कंपनियों में स्टारलिंक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और यूटेलसैट वनवेब शामिल हैं। स्टारलिंक एलन मस्क की स्पेसएक्स से जुड़ी कंपनी है। जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस रिलायंस समूह की सैटेलाइट सेवा से संबंधित इकाई है, जबकि यूटेलसैट वनवेब को भारती समूह का समर्थन प्राप्त है। इसके अलावा, अमेजन की प्रोजेक्ट कुइपर ने भी भारतीय बाजार में प्रवेश करने में रुचि दिखाई है। इन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा से देश में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं का विस्तार हो सकता है, खासकर उन दूरदराज के इलाकों में जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क और ब्रॉडबैंड की पहुंच सीमित है।
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुताबिक, स्टारलिंक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और यूटेलसैट वनवेब को सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए लाइसेंस मिल चुके हैं। हालांकि, लाइसेंस मिलने के बाद भी कंपनियां तुरंत व्यावसायिक सेवा शुरू नहीं कर सकतीं। इसके लिए सुरक्षा संबंधी मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है। स्पेक्ट्रम वह रेडियो फ्रीक्वेंसी संसाधन है, जिसके जरिए सैटेलाइट और अन्य दूरसंचार नेटवर्क संचार सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। सरकार को इसके इस्तेमाल से जुड़ी शुल्क व्यवस्था और अन्य शर्तों को भी अंतिम रूप देना है।
स्टारलिंक की मंजूरी में देरी के पीछे सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकताएं भी अहम हैं। अधिकारियों की चिंताओं में नेटवर्क के जरिए होने वाले संचार की वैध निगरानी, भारतीय उपयोगकर्ताओं के डेटा की सुरक्षा और इंटरनेट ट्रैफिक के संचालन से संबंधित व्यवस्थाएं शामिल हैं। विदेशी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क के भारत में संचालन के दौरान यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह भारतीय कानूनों और सुरक्षा नियमों का पालन करे। स्टारलिंक की ओर से पहले कहा गया है कि उसने भारत में अपने नेटवर्क की तैयारी की है और भारतीय उपयोगकर्ताओं का डेटा देश के भीतर रखने की व्यवस्था पर काम किया है। इसके बावजूद अंतिम मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है।
अब निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की आगामी चर्चा पर नजर रहेगी। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समिति किन विशिष्ट पहलुओं पर विचार करेगी या उसकी चर्चा के बाद कोई समयसीमा अथवा सिफारिश सामने आएगी। इस मामले में मुख्य सवाल यही है कि सुरक्षा संबंधी मंजूरियां और स्पेक्ट्रम आवंटन कब तक पूरे होंगे। फिलहाल सरकार का रुख है कि सभी कंपनियों को समान नियामकीय मानकों का पालन करना होगा। ऐसे में स्टारलिंक की भारत में व्यावसायिक शुरुआत का रास्ता कारोबारी आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ सरकारी मंजूरियों और सुरक्षा शर्तों के पूरा होने पर निर्भर करेगा।



